दिनांक: 17 जनवरी, 2026
बिहार सरकार ने राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह से बदलने के लिए एक बड़ा और कड़ा कदम उठाने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल ही में संकेत दिए हैं कि जल्द ही राज्य में सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाएगा।
इस फैसले ने राज्य के चिकित्सा जगत और आम जनता के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह फैसला क्या है और इसके क्या परिणाम हो सकते हैं।
सरकार इस फैसले पर विचार क्यों कर रही है?
सरकार का मानना है कि सरकारी डॉक्टर अस्पतालों में ड्यूटी के घंटों के दौरान या उसके बाद अपने निजी क्लीनिकों पर अधिक ध्यान देते हैं। इससे जुड़े मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
अस्पतालों में डॉक्टरों की अनुपस्थिति: कई बार डॉक्टर सरकारी ड्यूटी के समय ही अपने निजी क्लीनिक में पाए जाते हैं, जिससे गरीब मरीजों को इलाज नहीं मिल पाता।
संसाधनों का दुरुपयोग: ऐसी शिकायतें आती रही हैं कि सरकारी अस्पतालों की दवाओं या सुविधाओं का लाभ निजी मरीजों को दिलाने की कोशिश की जाती है।
स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार: सरकार चाहती है कि डॉक्टर अपना पूरा समय और विशेषज्ञता सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों (जैसे PMCH, NMCH) को दें।
डॉक्टरों के लिए क्या होगा विकल्प?
इस प्रतिबंध के बदले सरकार डॉक्टरों को 'नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस' (NPA) देने की योजना बना रही है। यह एक विशेष भत्ता होता है जो डॉक्टरों को प्राइवेट प्रैक्टिस न करने के बदले उनके वेतन के साथ दिया जाता है। सरकार डॉक्टरों के मूल वेतन और सुविधाओं में भी बढ़ोतरी पर विचार कर रही है ताकि वे आर्थिक रूप से प्रभावित न हों।
इस फैसले के पक्ष और विपक्ष में तर्क
| पक्ष में तर्क (आम जनता/सरकार) | विपक्ष में तर्क (डॉक्टरों का पक्ष) |
| सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की 24/7 उपलब्धता सुनिश्चित होगी। | वेतन और NPA निजी प्रैक्टिस से होने वाली आय के बराबर नहीं है। |
| गरीब मरीजों को बड़े विशेषज्ञों से मुफ्त परामर्श मिल सकेगा। | डॉक्टर अपनी मर्जी से काम करने की आजादी चाहते हैं। |
| अस्पतालों की ओपीडी (OPD) व्यवस्था में सुधार होगा। | अनुभव बढ़ाने और शोध के लिए प्राइवेट प्रैक्टिस को जरूरी मानते हैं। |
क्या होगा आम जनता पर असर?
यह फैसला बिहार के ग्रामीण और गरीब तबके के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगा। अक्सर देखा जाता है कि बेहतर इलाज की तलाश में लोग सरकारी अस्पतालों में आते हैं, लेकिन बड़े डॉक्टरों के न मिलने पर उन्हें मजबूरी में निजी क्लीनिकों की महंगी फीस भरनी पड़ती है। अगर यह कानून प्रभावी ढंग से लागू होता है, तो राज्य के सरकारी अस्पतालों की साख वापस लौटेगी।
चुनौतियां और राह
हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब इस तरह की चर्चा हुई है। इससे पहले भी कई बार प्रयास किए गए, लेकिन डॉक्टरों के विरोध के कारण फैसला वापस लेना पड़ा। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि:
क्या सरकार डॉक्टरों को संतुष्ट कर पाएगी?
क्या अस्पतालों में पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराया जाएगा?
निष्कर्ष
बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को 'बीमारू' छवि से बाहर निकालने के लिए कड़े फैसलों की जरूरत है। डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगाना एक साहसिक कदम है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार इसे जमीनी स्तर पर कैसे लागू करती है।
आपकी क्या राय है? क्या बिहार में सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस बंद होनी चाहिए? हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं।
